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विश्व की जनसंख्या

भारत की जनसंख्या

जनसंख्या का विषय
 महत्वपूर्ण क्यों है ?
सरलीकृत जनसंख्या की अवधारणा
सरकार के प्रचलित कार्यक्रम
जनसंख्या से संबंधित संपर्क

यौन और जनन स्वास्थ्य पर 
प्राय पूछे जाने वाले प्रश्नः

  सीधे उत्तर
 
विश्व की जनसंख्या
जनसांख्यिक संक्रमण क्या है?
विकासशील देश जनसांख्यिक संक्रमण प्राप्त करने 
में पीछे क्यों है?
 
भारत और जनसंख्या
जनसंख्या स्थिरीकरण का क्या आशय है?
जनसंख्या इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है, जबकि प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या में गिरावट आ रही है?
वे कौन से घटक हैं जो जनसंख्या वृद्धि को प्रभावित करते हैं?
   
लिंग अनुपात और जनसंख्या
देश का लिंग अनुपात क्या दर्शाता है?
0-6 वर्ष की आयुवर्ग में लिंग अनुपात गिरने के विषय में चिंता क्यों की जा रही है?
लिंग चयनात्मक गर्भपात रोकने के लिए क्या किया जा रहा है?
क्या महिलाओं की संख्या कम होने से उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है?
बेटे के जन्म को वरीयता देने में क्या गलत है?
बेटे को वरीयता देना जनसंख्या स्थिरीकरण में किस प्रकार बाधक है?
   
विकास और जनसंख्या
क्या जनसंख्या एक विकास का विषय है? 
क्या हम विकास पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं और जनसंख्या वृद्धि को अनियंत्रित छोड़ दें?
 
गरीबी और जनसंख्या
क्या बन्ध्यीकरण लोगो के लिए विकल्प है?
   
लिंग और जनसंख्या
मातृ मृत्यु कम करने के लिए क्या किए जाने की आवश्यकता है?
माँ और बच्चे के जीवित रहने के लिए प्रसव पूर्व देखरेख कैसे महत्वपूर्ण है?
 
बाल स्वास्थ्य और जनसंख्या
भारत में बहुत से बच्चे कम वजन वाले क्यों पैदा होते हैं?
गर्भनिरोध और जनसंख्या
गर्भनिरोध किसे कहते हैं?
भारत में "मिश्रित विधि" गर्भ निरोधक प्रयोग करने का क्या पैटर्न है?
जनसंचार के अभियानों के बावजूद भी हम लोगों के गर्भनिरोधक व्यवहार में परिवर्तन करने में सफल क्यों नहीं हुए?
भारत में अंतराल विधियों का उपयोग इतना मंद क्यों है?
जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए बच्चों के जन्म के बीच अंतराल रखना महत्वपूर्ण क्यों है?
अंतराल विधियों को किस प्रकार से बढ़ावा दिया जा सकता है?
पुरूष बन्ध्यीकरण कुछ ही दंपत्ति क्यों करना चाहते हैं?
यदि लोग अन्य विधियों में से किसी एक विधि विशेष को अपनाना चाहते हैं तो उस विधि को बड़े स्तर पर प्रोत्साहित करने में क्या गलत है?
भारत में इंजेक्शन द्वारा दिए जाने योग्य गर्भनिरोधकों का उपयोग प्रारम्भ किए जाने का कुछ लोग विरोध क्यों करते है?
 
युवा और जनसंख्या
हम युवाओं पर ही ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता क्यों समझते हैं? क्या जनन स्वास्थ्य शादी के समय प्रारम्भ नहीं होता।
क्या किशोरों को यौन शिक्षा देने से स्वच्छन्द कामवासना को प्रोत्साहन मिलता है?
शादी की उम्र बढ़ा देने से जनसंख्या स्थिरीकरण पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है?
 
एच.आई.वी./एड्स और जनसंख्या
जनसंख्या कार्यक्रमों में हमें एच.आई.वी./एड्स विषयों पर ध्यान केन्द्रित क्यों करना चाहिए?

 

  

हम कल के माता-पिता कैसे बन सकते हैं?
भारत में 15-34 वर्ष की आयु वर्ग में 3480 लाख लोग विद्यमान है। तथापि, इतने अधिक लोगों को विषम सामाजिक और आर्थिक विकास के कारण अपनी पूर्ण अंतःशक्ति प्राप्त करने के सीमित अवसर प्राप्त है। भारत के नौजवान अपने कौशल का विकास करने, शिक्षा प्राप्त करने और रोजगार प्राप्त करने के अवसरों की मांग करते हैं। भारत में विकास संबंधी हमारे सभी प्रयास केवल शरहों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी किए जाने चाहिए जहाँ भारत की अधिकांश जनता रहती है।

क्या आज की युवा पीढ़ी अपनी उन पूर्व पीढ़ियों की भांति बड़ा परिवार रखना पसंद करेगी, जिनके लिए गर्भनिरोधक के विकल्प सीमित थे और स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं भी अच्छी स्तर की नहीं थी अथवा क्या उन्हें इस संबंध में जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी और वे उस मार्ग को अपनाने में समर्थ होंगे जो जनसंख्या स्थिरीकरण की ओर ले जाता है? यह चुनौती यह सुनिश्चित करने पर निर्भर है कि 3480 लाख व्यक्ति स्वास्थ्य और गर्भनिरोधक सेवाओं के लाभ प्राप्त कर रहे हैं क्योंकि वे लोग ही वह जन्म दर निश्चित करेंगे जिस पर भारत की जनसंख्या की भविष्य में वृद्धि होगी।

0-14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के लिए पोषण, उनके स्वास्थ्य की देखरेख करने और उनहें प्राथमिक शिक्षा दिलाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि वे बच्चे ही भविष्य की आधारशिला का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके विकास काल में उन पर किया गया निवेश उनहें एक समझदार और शिक्षित नागरिक बनाएगा।

विश्व की जनसंख्या

जनसांख्यिक संक्रमण क्या है?
"जनसांख्यिक संक्रमण" एक मॉडल है जो एक लंबे समय के दौरान हुए जनसंख्या परिवर्तन दर्शाता हैं। यह "जनसंख्या वृद्धि के उन चार स्तरों को स्पष्टतः परिभाषित करता है जिनमें से राष्ट्रों को अपने सामाजिक आर्थिक विकास के साथ आगे-पीछे गुजरना पड़ता है।

स्तर-1 : यह अल्प विकसित देशों में विशिष्ट रूप से देखा जाता है। यहां जन्म दर अधिक होती है परन्तु बहुत बड़ी संख्या में लोग निरोध्य कारणों से मृत्यु के मुंह में जले जाते हैं जिससे जनसंख्या स्थिर रहती है।

स्तर - 2 : मृत्यु दर में बहुत तेजी से गिरावट आती है क्योंकि निरोध्य कारणों से होने वाली मौतों को बेहतर आहार आपूर्ति और उन्नत जन स्वास्थ्य कार्यक्रम के जरिए कम कर दिया जाता है, परन्तु उच्च जननक्षमता, कम सामाजिक विकास और स्वास्थ्य एवं गर्भनिरोधक सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण जन्म दर अधिक ही बनी रहती है। इस कारण जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ती है।

स्तर-3 : जन्म दर में गिरावट आती है परन्तु जनसंख्या निरंतर बढ़ती रहती है क्योंकि पूर्ववर्ती पीढ़ियों की उच्च जननक्षमता के कारण जनन आयु वर्ग के लोगों की संख्या काफी अधिक होती है।

स्तर - 4 : देश निम्न जन्म और निम्न मृत्यु दरों के साथ एक बार पुनः जनसंख्या में स्थिरता प्राप्त कर लेते हैं लेकिन सामाजिक और आर्थिक विकास का स्तर ऊँचा रहता है। जनसंख्या स्थिर तो रहती है लेकिन स्तर-1 की जनसंख्या से अधिक होती है।

उच्च मृत्युदर और उच्च जननक्षमता के साथ स्थिर जनसंख्या से निम्न मृत्युदर और निम्न जननक्षमता के साथ स्थिर जनसंख्या और उच्च जननक्षमता के साथ स्थिर जनसंख्या से निम्न मृत्युदर और निम्न जननक्षमता के साथ स्थिर जनसंख्या का होना यह संक्रमण जनसांख्यिक संक्रमण कहलाता है। इस समय भारत तीसरे स्तर से गुजर रहा है।

विकासशील देश जनसांख्यिक संक्रमण प्राप्त करने में पीछे क्यों है?
विकासशील देश ऐतिहासिक कारणों से जनसांख्यिक संक्रमण प्राप्त करने में पीछे है। विकसित विश्व में 1800 वीं शताब्दी के दौरान औद्योगिक क्रान्ति हुई जिसके समग्र विकास और संपन्नता की लहर दौड़ गई जिसके परिणाम स्वरूप मृत्यु और जन्म दोनों दरों में कमी आ गई विकासशील विश्व ने उपनिवेशबाद और कम वृद्धि के कारण यह अवसर खो दिया। स्थानीय गरीबी, शिक्षा का निम्न स्तर और परिवार नियोजन कार्यक्रमों के अभाव के कारण विकासशील देशों के अनेक भागों में प्रत्येक महिला ने औसतन छ: से अधिक बच्चों को जन्म दिया। उच्च जनसंख्या वृद्धि के इस लंबे समय के परिणाम स्वरूप युवा जनसंख्या अधिक हो गई जिससे जनसंख्या वृद्धि में उच्च संवेग आया और जनसांख्यिक संक्रमण की अवधि दीर्घ हो गई।

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भारत और जनसंख्या

जनसंख्या स्थिरीकरण से क्या आशय है?
जनसंख्या स्थिरीकरण एक वह स्तर है जहां जनसंख्या के आकार में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसे शून्य जनसंख्या वृद्धि स्तर भी कहा जाता है। जब जन्मदर और मृत्युदर बराबर हो जाती है तो यह कहा जाता है कि जनसंख्या स्थिर हो रही है। तथापि, देश विशेष के मामले में देश में आने वाले और देश से बाहर जाने वाले लोगों की भी गणना जनसंख्या में की जाती है। देश स्तर पर जनसंख्या उस समय स्थिर होती है जब देश में जन्मे बच्चों और देश में आने वाले व्यक्तियों की संख्या देश में मरने वालों और देश से बाहर जाने वाले व्यक्तियों के बराबर हो जाती है।

जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए जन्म लेने वाले प्रत्येक बच्चे के लिए एक व्यक्ति को मर जाना चाहिए परन्तु मरने वाले बूढ़े लोगों की अपेक्षा अधिकांश युवा दंपत्ती अपना परिवार प्रारम्भ करते है, जिससे जनसंख्या में निरंतर वृद्धि होती है। यह जनसंख्या संवेग कहलाता है।

इस प्रकार, प्रतिस्थापन स्तर जननक्षमता (प्रति दंपत्ति 2 बच्चे) और जनसंख्या स्थिरीकरण प्राप्त करने के बीच कुछ दशकों का अंतर रहता है। भारत ने 2010 तक जननक्षमता का प्रतिस्थापन स्तर प्राप्त करने का अपना लक्ष्य तय कर लिया है ताकि वर्ष 2045 तक जनसंख्या स्थिरीकरण का वृहत लक्ष्य प्राप्त किया जा सके-35 वर्ष का अंतर जनसंख्या संवेग के लिए रखा गया है।

जनसंख्या इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही जबकि प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या कम हो रही है?
भारत में प्रति वर्ष 180 लाख व्यक्ति बढ़ते रहते हैं क्योंकि 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या जनन आयु वर्ग की है। यह युवा लोगों का वृहत आधार है जो जनसंख्या वृद्धि को संवेग देता है पूर्ववर्ती वर्षों में उच्चजन्म दर होने के कारण जनन आयु वर्ग में आने वाले व्यक्तियों की संख्या प्रति वर्ष बढ़ रही है।

देर से शादी करके तथा बच्चे देर से पैदा करके और दो बच्चों के बीच पर्याप्त अंतर रखकर जनसंख्या संवेग को रोका जा सकता है।

जनसंख्या वृद्धि को प्रबावित करने वाले कौन से घटक है?
देश में जन्म लेने वालों और मरने वालों की संख्या के बीच के अंतर का पता प्राकृतिक वृद्धि से लगता है। देश में मृत्यु दर में कमी आई है परन्तु जन्म दर ऊँची रही है, जन्म दर ऊँची होने के दो कारण हैं -

प्रथम कारण है अवांछित और अनायोजित जननक्षमता-गर्भनिरोधक सेवाओं तक पहुंच का अभाव होने के कारण जन्मे बच्चे भी "अनापूर्ति आवश्यकता" के रूप में जाने जाते हैं। प्रत्येक वर्ष 260 लाख जन्म लेने वालों में से 45 प्रतिशत ऐसे बच्चे होते हैं जो तीन या तीन से अधिक बच्चों के बाद पैदा होते हैं।

सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों, विशेषतः बेटे के लिए वरीयता और उच्च शिशु मृत्युदर के कारण बड़े परिवार की इच्छा होना (जिसे "बांछित जननक्षमता" कहा जाता है) दूसरा कारण है। कुल जन्में बच्चों में से ऐसे 20 प्रतिशत बच्चे होते हैं।

अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि युवा वर्ग के लोगों द्वारा जनसंख्या संवेग उत्पन्न होता है जिससे जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ती है। यह स्थिति अभी निरंतर रहेगी और आगामी दशकों के दौरान भारत की जनसंख्या में वृद्धि होती रहेगी।

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लिंग अनुपात और जनसंख्या

देश का लिंग अनुपात क्या दर्शाता है?
जहां पुरूषों और महिलाओं को जीवित रहने के लगभग समान अवसर प्राप्त होते हैं वहां समाज में पुरूषों और महिलाओं की संख्या का भी लगभग बराबर होना अनिवार्य है। तथापि भारत में महिलाओं में उच्च मृत्यु दर होने, विशेषतः उनकी जनन अवधि के दौरान मृत्यु होने के कारण पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या काफी कम है।

भारत की जनसंख्या में लिंग अनुपात में लगातार कमी आ रही है। वर्ष 1901 में प्रति 1000 पुरूषों के पीछे 972 महिलाएँ थी जो वर्ष 2001 में प्रति 1000 पुरूषों के पीछे महिलाओं की संख्या घट कर 933 रह गई। यह स्थिरि चिंता का विषय है क्योंकि समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य और सामाजिक स्तर को बताने वाला एक प्रभावी सूचक है जो बाल मृत्युदर जैसे अन्य सूचकों को प्रत्यक्ष और तत्काल प्रभावित करता है।

लिंग अनुपात की गणना विभिन्न आयु वर्गों के लिए की जाती है परन्तु 0-6 वर्ष की आयु वर्ग की गणना अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यहां प्रतिकूल लिंग अनुपात यह दर्शाता है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियाँ कम पैदा की जा रही हैं और इससे यह पता लगता है कि कन्या भ्रूण के प्रति पक्षपात किया जा रहा हैं यह पक्षपात गर्भधारण करने, गर्भावधि या प्रसव के दौरान किया जा सकता है। 0-6 वर्ष की आयु के बीच प्रतिकूल लिंग अनुपात भी दर्शाता है कि कन्या के जीवित रहने के अवसरों का निर्धारण सामाजिक-सांस्कृतिक घटकों के आधार पर किया जा रहा है।

0-6 वर्ष की आयु के मध्य लिंग अनुपात में कमी आना चिंता का विषय क्यों है?
0-6 वर्ष के आयु वर्ग के मध्य लिंग अनुपात में गिरावट आना विशेष रूप में चिंता का विषय है क्योंकि यह जन्म पूर्व लिंग चयन करने की बढ़ती हुई घटनाओं की ओर इशारा करता है। लिंग चयन करने वाली प्रक्रियाओं की सुगमता से उपलब्धता और जन्म पूर्व लिंग चयन करने की अनैतिक प्रथा इस वर्तमान स्थिति के लिए एक बहुत बड़ी सीमा तक उत्तरदायी है।

वास्तविकता यह है कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से सुविकसित राज्यों में भी 0-6 वर्ष की आयु के मध्य लिंग अनुपात काफी कम है, अतः ऐसे राज्यों को आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है। जिन छः राज्यों में यह अनुपात बहुत तेजी से कम हुआ है वे राज्य आर्थिक रूप से सुविकसित राज्यों में से हैं। ये राज्य और संघ राज्य क्षेत्र हैं - चण्डीगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब। यह संभव है कि बेटे के लिए वरीयता तथा लिंग चयनात्मक प्रक्रियाओं की सुगमता से उपलब्धता में परिवर्तन लाने के लिए अपेक्षित सामुदायिक हस्तक्षेप के बिना छोटे परिवारों को तेजी से प्रोत्साहन देने के कारण कन्या के जन्म और उसके जीवन को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

अत्यधिक घनी आबादी वाले 10 देशों का लिंग अनुपातः

विश्व

990

बंग्लादेश

952
ब्राजील 1,031
चीन 943
भारत 933
इण्डोनेशिया 1,000
जापान 1,041
नाइजीरिया 990
पाकिस्तान 952
सोवियत संघ 1,136
संयुक्त राज्य अमेरिका 1,031

स्रोतः " संभाव्य विश्य जनसंख्या/संशोधन 2002", संयुक्त राष्ट्र विश्वजनसंख्या प्रभाग। संभाव्य विश्व जनसंख्या रिपोर्ट 2002, के अनुसार दी गई सूची में भारत का लिंग-अनुपात 943 दिखाया गया है। तथापि, इस तालिका में उदघृत आंकड़ों से नवीनतम भारतीय जनगणना के आंकड़ों का पता लगता है?

0-6 वर्ष की आयु में लिंग अनुपात
चण्डीगढ़ 845
दिल्ली 868
गुजरात 883
हरियाणा 819
हिमाचल प्रदेश 896
पंजाब 798
भारत 927

स्रोत : भारत की जनगणना, 2001

लिंग चयनात्मक गर्भपात रोकने के लिए क्या किया जा रहा है?
भारत में लिंग चयनात्मक गर्भपात गैर-कानूनी हैं। प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग का निवारण) अधिनियम, 1994 में अधिनियमित किया गया था और प्रथम जनवरी, 1996 से प्रचलन में लाया गया ताकि कन्या भ्रूण हत्या को रोका जा सके। इस अधिनियम के अधीन नियम भी बनाए गए हैं। अधिनियम के अंतर्गत भ्रूण का लिंग निर्धारित करना और बताना निषेध है। यह अधिनियम लिंग का प्रसव पूर्व निर्धारण करने से संबंधित किसी भी विज्ञान पर रोक लगाता है। और इसके उल्लंघन के लिए दंड निर्धारित करता है। इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लघंन करने वाले व्यक्ति को सजा और जुर्माना दोनों का दंड दिया जा सकता है।

गर्भधारण करने से पहले और बाद में लिंग का चयन करने के लिए ईजाद की गई नई-नई टेक्नॉलॉजी और इस अधिनियम के कार्यान्वयन में आने वाली समस्याओं को ध्यान में रखते हुई प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीक अधिनियम और नियमों को अभी हाल में ही संशोधित किया गया है। ये संशोधन 14 फरवरी 2003 से प्रभावी हैं।

इस अधिनियम के अधीन, लिंग की जांज करवाने वाले व्यक्ति को, प्रथम बार दोषी पाए जाने पर तीन वर्ष का कारावास की सजा होगी और उसे 50,000/- रु. जुर्माने के रूप में अदा करने होंगे। लिंग निर्धारण करने वाले चिकित्सा व्यवसायी का पंजीकरण रद्द कर दिया जाएगा और प्रैक्टिस करने का उसका अधिकार समाप्त हो जाएगा बशर्तें कि वह इस अधिनियम के अधीन दोषी पाया जाए। तथापि, अधिकारियों का मानना है कि इस अधिनियम को कार्यान्वित करना कठिन कार्य है क्योंकि लिंग निर्धारण करने का कार्य डाक्टर और रोगी की गोपनीयता में किया जाता है।

जन्म पूर्व लिंग चयन करने के विरूद्ध कई गैर सरकारी संगठन सक्रिय है। अब कई स्वास्थ्य प्राधिकारियों का ध्यान भी इस विषय पर जा रहा है जिन्हों ने लिंग चयन करने के साक्ष्य एकत्र करने के लिए निदानशालाओं और अस्पतालों के अभिलेखों पर अनुवीक्षण करना प्रारम्भ कर दिया है ताकि दोषी पाए गए व्यक्तियों के विरूद्ध उचित कार्यवाई की जा सके।

क्या महिलाओं की संख्या कम होने से उनकी स्थिति में सुधार हुआ है?
नहीं, भारत एक अत्यधिक पितृसत्तात्मक समाज रहा है जहां महिलाओं को किनारे पर रखा जाता है और विकास के लाभ देने से मना कर दिया जाता है गिरता हुआ लिंग अनुपात इस विद्यमान लिंग आधार का प्रतिबिंब है।

निम्न लिंग अनुपात वाले कुछ जिलों में, इसका प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता हैं जहां बहुत से पुरूषों को पत्नियां नहीं मिल पाती। अब बहुपति तथा "दुल्हन की कीमत" और "दुल्हन की बिक्री" जैसी प्रथाएं भी चल पड़ी हैं जिनमें महिलाओं का क्रय/विक्रय कीमत के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार प्रचलित सामाजिक संदर्भ में, महिलाओं की संख्या कम होने से उनके प्रति अपराध बढ़ेंगे और उन्हें शक्तिशाली बनाए जाने की अपेक्षा उनके अधिकारों से बंचित कर दिया जाएगा।

पुत्र के जन्म को वरीयता देने में गलत क्या है?
भारतीय समाज में अनुभूत आर्थिक और परंपरागत कारणों की वजह से पुत्र के जन्म को वरीयता देना सर्वविदित है। पारिवारिक संपत्ति और नाम के लिए एक वैध और सक्षम उत्तराधिकारी के रूप में देखे जाने के अलावा वंश को आगे बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में भी देखा जाता है तथा यह भी माना जाता है कि पुत्र अपने माता-पिता का बुढ़ापे का सहारा बनेगा। पुत्र का महत्व इस मान्यता के कारण भी बढ़ जाता है कि वह अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार पूरा करके उन्हें मुक्ति दिलाता है।

दहेज जैसी सामाजिक बुराई के कारम लड़कियों को प्रायः एक भार के रूप में माना जाता है क्योंकि उनके माता-पिता को उनकी शादी पर बहुत अधिक धन खर्च करना पड़ता है। लड़कियों पर किए गए खर्च को फुजूलखर्च माना जाता है क्योंकि वे शादी के बाद अपने पति के घर चली जाती हैं और प्रायः अपनी आय में से अपने माता-पिता को हिस्सा नहीं दे सकतीं।

जहां ऐसी मान्यताएं विद्यमान हों, वहां माता-पिता लड़कियों की अपेक्षा लड़कों पर अधिक खर्च करते हैं, चाहे वह खर्च पोषण पर हो, स्वास्थ्य पर हो, शिक्षा पर हो या उनके भविष्य बनाने पर हो। ऐसा पक्षपात, चाहे वह प्रत्यक्ष रूप से हो या गुप्त रूप से हो, लड़कियों को उपलब्ध विकास की सुविधाओं को सीमित कर देता है जिससे लड़कियों के प्रति भेदभाव और सुदृढ़ हो जाता है।

कम से कम एक पुत्र ही होने की धुन महिलाओं पर जबरदस्त मानसिक दबाव डालता है, वे लिंग जांच कराने के बाद बार-बार गर्भपात करवाती है। घरेलू हिंसा से बचने के लिए भी बेटे का पैदा होना महत्वपूर्ण हे अन्यथा पुत्र पैदा करने में अपनी "असमर्थता" का धब्बा उन पर लग जाता है और उनके पतियों को दूसरा विवाह करने और उन्हें तलाक देने का बहाना मिल जाता है। पुत्र के जन्म को वरीयता देना स्पष्टतः गलत है क्योंकि इससे बेटी का कम मूल्यांकन किया जाता है और जीवित रहने, वृद्धि करने और विकास के मूल अधिकारों से उन्हें बंचित कर दिया जाता है।

इसके अलावा पुरूषों को वरीयता देने की कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ती है, इससे समाज में पुरूषों की प्रधानता और मजबूत होती है और निष्पक्ष न्यायोचित एवं समान समाज का निर्माण करना एक दुष्कर कार्य हो जाता है। ऐसी विषम परिस्थितियों में महिलाओं को समाज में बराबर का दरजा देने के लिए उन्हें अधिकार देने की दिशा में कोई प्रगति नहीं की जा सकती।

जनसंख्या स्थिरीकरण में पुत्र की वरीयता किस प्रकार बाधक है?
पुत्र को वरीयता देना जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए एक बहुत बड़ी बाधा है क्योंकि इससे दंपत्ती परिवार में कम से कम एक पुत्र हो, इस चाह में अधिक बच्चे पैदा करते रहते हैं।

पुत्र को वरीयता प्रत्येक राज्य में दी जाती है तथापि उत्तप प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और अरूणाचल प्रदेश में इसका प्रचलन अधिक पाया जाता है। इन राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर भी अधिक है। तमिलनाडू, केरल, कर्नाटक और गोवा में पुत्र को वरीयता सबसे कम दी जाती है, ये ऐसे राज्य हैं जो जननक्षमता प्रतिस्थापन स्तर प्राप्त कर चुके हैं या प्राप्त करने ही वाले हैं। इन राज्यों में लड़का - लड़की का अनुपात जैसे धनाढ्य राज्यों में दंपत्ती छोटा परिवार पंसद कर रहे हैं परन्तु बेटे की चाह के कारण वे प्रसवपूर्ण लिंग चयन करते हैं जिसकी वजह से प्रतिकूल लिंग अनुपात बढ़ रहा है।

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विकास और जनसंख्या

क्या जनसंख्या विकास का विषय है?
हां, यह विकास का विषय है। प्रायः जनसंख्या को लोगों की बढ़ती हुई संख्या के विषय के रूप में देखा जाता है परन्तु तथ्य यह है कि लोगों बढ़ती हुई संख्या सामाजिक और आर्थिक विकास के अभाव का प्रतिबिंब है। सामाजिक आर्थिक विकास का स्तर निम्न हो जाता है और उस वर्ग के दंपत्तियों में अधिक बच्चे पैदा करने की संभावना बढ़ जाती है।

भारत के विभिन्न राज्यों मे यह अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में साक्षरता का स्तर 56.3 प्रतिशत है और प्रसवपूर्व देखरेख की पूर्ण सूविधा केवल 14 प्रतिशत महिलाओं को मिल पाती है। उत्तर प्रदेश में प्रति दंपत्ती चार बच्चों का औसत है, जो केरल में दंपत्ती दो बच्चों की संख्या से लगभग दुगना है जहां प्रत्येक महिला को प्रसवपूर्ण देखरेख की संपूर्ण सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं तथा संस्था में प्रसव कराया जाता है। इस प्रकार केरल अपने उन्नत सामाजिक विकास के कारण दो दशक पहले ही उस स्तर को प्राप्त कर चुका है जिसे "जननक्षमता का प्रतिस्थापन स्तर" कहा जाता है जबकि उत्तर प्रदेश को यह स्तर प्राप्त करने में अभी 20 वर्ष का समय और लगेगा क्योंकि यहां उच्च जननक्षमता दर (टी.एफ.आर. 4.4) अभी जारी है।

क्या जनसंख्या वृद्धि छोड़ कर विकास की बात कर सकतेहैं?
नहीं। सामाजिक आर्थिक विकास का लाभ मिलनें में काफी लंबा समय लगता है, इसलिए ऐसे उपाय करना महत्वपूर्ण है, जिससे लोग बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त कर सकें जिनका उनके जनन स्वास्थ्य व्यवहार पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जो लोग बच्चे पैदा नहीं करना चाहते परन्तु परिवार नियोजन की विधियों तक उनकी पहुंच नहीं है ऐसे लोगों को गर्भनिरोधक सेवाओं सहित अच्छे स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करके भारत में जन्म दर में कम से कम 20 प्रतिशत की कमी की जा सकती है।

गर्भनिरोधक सेवाएं तीन भागों में दी जानी चाहिए-

क.  परामर्श देकर जिसमें क्यों, कब और कौन सी विधि विशेष किस प्रकार अपनाएं, बताना शामिल है,
ख.  चुनी हुई विधि की आसानी से उपलब्धता और सुलभता सुनिश्चित करना और
ग.  अनुवर्ती देखरेख करना ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उस विधि का निरंतर उपयोग किया जा रहा है और उससे कोई परेशानी नहीं है।

इसके साथ ही, किशोर यौन और जनन स्वास्थ्य सेवाएं विशेषतः लोगों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि वे अपने यौन और जनन व्यवहार के संबंध में अवगत और उत्तरदायी निर्णय. ले सकें, इन युवाओं में उस उम्र की भी युवा सम्मिलित हैं। जिस उम्र पर वे अपनी शादी करते हैं और अपना पारिवारिक जीवन प्रारम्भ करते हैं। इससे सुरक्षित यौन संबंध रखने के लिए कण्डोम का प्रयोग करने और पहला बच्चा देर से पैदा करने तथा परवर्ती गर्भों के बीच पर्याप्त अंतर रखने के लिए अन्य गर्भनिरोधक विधियों का प्रयोग करने में युवाओँ को मदद मिलेगी।

बाल पोषण के लक्ष्य के बारे में अलग से बताया जाना चाहिए। विद्यालयों में ^^मध्य अवकाश आहार^^ योजना प्रारम्भ किए जाने से विद्यालयों में बच्चों की संख्या में वृद्धि हुई है तथा बच्चों के पोषण स्तर में सुधार हुआ है। यह योजना बच्चों के जीवन को सुधारने और बड़े परिवार की इच्छा को कम करने में भी प्रभावी सिद्ध हुई है।

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निर्धनता और जनसंख्या

क्या लोगों का बन्ध्यीकरण करना एक विकल्प है?
किसी भी प्रकार की जबरदस्ती करना सिद्धांत गलत है और मूल मानव मूल्यों के प्रतिकूल है तथा मानव अधिकारों का उल्लंघन है। यह कहना कि अवपीड़क बन्ध्यीकरण एक विकल्प है, य़ह ऐसे दिमाग की उपज है जो लोगों को उनके अपने अधिकारों और आवश्यकताओं के सहित एक मानव प्राणी मानने की अपेक्षा एक लक्ष्य के रूप में मानते हैं।

इसके अलावा, कुछ भारतीय राज्यों का अनुभव यह स्पष्ट रूप से बताता है कि मानव अधिकारी और आजादी से समझौता किए बिना जननक्षमता का प्रतिस्थापन स्तर प्राप्त किया जाना संभव है। चीन और केरल में जनन क्षमता में आई गिरावट की तुलना से यह पता लगता है कि केरल ने कोई भी अवपीड़क नीति अपनाए बिना चीन की तुलना में पर अधिक नियंत्रण किया है। वर्ष 1979 में चीन की कुल जननक्षमता दर (टी.एफ.आर) 2.8 थी जो 1991 में घट कर 2.0 रह गई, जबकि वर्ष 1979 में केरल की कुल जननक्षमता दर (टी.एफ.आर) 3.0 थी जो 1991 में घटकर 2.2 रह गई। स्वास्थ्य सेवाओं तक सुगम पहुंच और महिलाओं की शिक्षा ने केरल में जननक्षमता दर कम करने में मदद की जबकि तमिलनाडू में इसका अत्यधिक महत्वपूर्ण कारक था बाल पोषण का समर्थन करने वाले सफल कार्यक्रम तथा गर्भनिरोधक आवश्यकताओं की पूर्ति करने पर केन्द्रित हस्तक्षेप।

जननक्षमता स्तर कम करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में से एक महत्वपूर्ण कारक है गर्भनिरोध के लिए अनापूर्ति आवश्यकता की पूर्ति करना। इस प्रयास से जननक्षमता स्तर में लगभग 20 प्रतिशत की कमी हो सकती है। बच्चे की जीवत रहना सुनिश्चित होने पर जन्म दर में 20 प्रतिशत की और कमी हो सकती है।

बाल पोषण के लक्ष्य पर अलग से प्रकाश डाला जाना चाहिए। विद्यालयों में ^^मध्यावकाश आहार^^ योजना लागू करने से विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हुई है तथा बच्चों के पोषण स्तर में भी सुधार आया है। यह योजना बच्चे के जीवित रहने के अवसरों को उन्नत करने में काफी प्रभावी सिद्ध हुई है और इससे बड़े परिवार की इच्छा भी कम हुई है।

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लिंग और जनसंख्या

मातृ मृत्युदर कम करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
मातृ मृत्युदर को कम करने के लिए सर्वप्रथम यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि गर्भवती महिला को प्रसवपूर्व, प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद अच्छे स्तर की ऐसी सेवाएं मिल रही है, जो गर्भावस्था के दौरान होने वाले जोखिमों को दूर कर सकें और उसे समय पर सहायता दी जा रही है। सुरक्षित प्रसव के लिए यह आवश्यक है प्रसव किसी संस्था में और प्रशिक्षित परिचारिकाओं से कराया जाना चाहिए और जो महिलाएं अभी भी घर पर प्रसव कराती हैं उन्हें प्रसव किट उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि प्रसव के दौरान कोई जोखिम न हो।

प्रसूति संबंधी जटिलताओं से निबटने के लिए व्यवस्था का सुदृढ करना और आपाती प्रसूति संबंधी सेवाओं की उपलब्धता मे वृद्धि करना भी महत्वपूर्ण है। प्रसूति संबंधी जटिलताओं के खतरों से परिवार और समाज के सदस्यों को अवगत कराकर, समुदाय आधारित परिवहन सुविधाएं उपलब्ध कराकर और स्वास्थ्य केन्द्रों पर आपाती प्रसूति संबंधी देखरेख की व्यवस्था करके ऐसी महिलाओँ को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है जिनकी मृत्यु प्रसव के समय चिकित्सा सहायता देर से मिलने के कारण हो जाती है।

किशोर और जनन स्वास्थ्य कार्यक्रमों की सहायता से युवा पीढ़ी उत्तरदायी यौंन व्यवहार अपनाती है जिसके परिणाम स्वरूप किशोरियों के गर्भवती होने या अविवाहित गर्भों की संख्या बहुत कम हो जाती है, भारत में जिनकी पराकाष्ठा अविवाहित गर्भों के साथ जुड़े कलंक के कारण असुरक्षित गर्भपात में होती है। सुरक्षित गर्भपात संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराने से महिलाओं को अपने जीवन से कोई जोखिम उठाए बिना अवांछित गर्भ गिरवाने में सहायता मिलेगी। दक्ष गर्भनिरोधक सेवाएं उपलब्ध कराने से अवांछित गर्भों और अवैध गर्भपातों से बचा जा सकता है।

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के जीवित रहने के अवसरों में सुधार करने के लिए लड़कियों और महिलाओं के समग्र स्वास्थ्य और पोषण स्तर में सुधार करना भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। प्रभावी सांस्कृतिक रीतिरिवाजों और प्रथाओं के कारण महिला के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी आवश्यकताओं की प्रायः उपेक्षा कर दी जाती है। जिसके परिणामस्वरूप, महिलाओ को स्वास्थ्य सेवाएं सक्रिय रूप से प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता उन्हें अनर्थकारी परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

अतः इस विचार धारा में परिवर्तन के लिए व्यक्तिगत, परिवार और समाज के स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है ताकि समाज उच्चतम प्राथमिकता प्राप्त करने योग्य व्यक्ति की भांति महिलाओं का ओर विशेषतः गर्भवती महिलाओं का विशेष रूप से सम्मान करें।

मां और बच्चे के जीवित रहने के लिए प्रसवपूर्ण देखरेख किस प्रकार महत्वपूर्ण है?
प्रसवपूर्व देखरेख के अंतर्गत कम से कम पांच मूलभूत सेवाएं सम्मिलित हैं- गर्भावस्था में मांनीटर करना, टेटनस की टीका लगाना, ऑयरन और फॉलिक एसिड (आई.एफ.ए) की गोलियां देना तथा पोषण/सुरक्षित प्रसव संबंधी परामर्श देना। इन उपायों की सहायता से महिलाएं गर्भावस्था के दौरान सुरक्षित रह सकती है और यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि नवजात बच्चा स्वस्थ्य है।

तथापि, बहुत सी महिलाएं इन मूलभूत सेवाओं तक नहीं पहुंच पाती जिसके परिणामस्वरूप वे अरक्तता, रतौंधी, जन्म के समय बच्चे का वजन कम होना या प्रसव संबंधी रक्तस्राव जैसी परिहार्य जटिलताओं की शिकार हो जाती है।

मां और बच्चे के स्वास्थ्य और जीवित रहने के अवसर पर प्रसवपूर्व देखरेख का प्रभाव स्वतः स्पष्ट है। जिन राज्यों प्रसवपूर्व देखरेख बेहतर स्तर पर की जाती है, वहां शिशु मृत्यु दर में विशिष्ट रूप से गिरावट आई है।

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बाल स्वास्थ्य एवं जनसंख्या

भारत वर्ष में जन्म के समय बहुत से बच्चों का वजन कम क्यों होता है?
जन्म के समय जिस बच्चे का वजन 2.5 कि. ग्रा. से कम होता है उसे कम भार वाले जन्मे बच्चे के रूप में माना जाता है। भारत वर्ष में जन्म के समय कम से कम 70 प्रतिशत बच्चों का वजन किया ही नहीं जाता।

बच्चे का पोषण स्तर किशोर अवस्था और गर्भावस्था में महिलाओं के पोषण स्तर से प्रारम्भ होता है। मां का स्वास्थ्य औप पोषण अच्छे स्तर का न होने और भ्रूण का कम विकास होने के कारण जन्म के समय बच्चे का वजन कम होता है। ये शिशु संक्रमण, कमजोर प्रतिरक्षा, पढ़ाई में असमर्थता. दर्बल शारीरिक विकास से पीड़ित रहते हैं और कई मामलों में तो जन्म के तुरन्त बाद ही उनकी मृत्यु हो जाती है।

जिस मां को युवा अवस्था से ही संतुलित भोजन नहीं मिलता उसके कम वजन वाले बच्चे के पैदा होने की संभावना काफी बढ़ जाती है और फिर यह चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। अपर्याप्त भोजन या विश्राम, धूम्रपानर, संक्रमण, वे सांस्कृतिक प्रथाएं जिनके कारण गर्भावस्था के दौरान महिला को अच्छी खुराक नहीं देते ताकि उसका वजन अधिक न हो जाए, और लंबे समय तक शारीरिक श्रम करते रहने से कम वजन वाला बच्चा पैदा के अवसर अधिक हो जाते हैं।

गर्भों के मध्य समय का अंतराल न होने और बार-बार गर्भधारण करने से भी अधिक जोखिम बढ़ जाता है।

विटामिन ए, आयोडिन, फोलेट, जिंक जैसे अन्य सूक्ष्म पौष्टिक पदार्थ पर्याप्त मात्रा में न लेने के कारण मां और भ्रूण दोनों पर तथा गर्भ में पल रहै बच्चे पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

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गर्भनिरोध और जनसंख्या

गर्भनिरोध क्या है?
विभिन्न साधनों में से किसी एक साधन का प्रयोग करके जानबूझकर गर्भधारण न करना ही गर्भ निरोध कहलाता है। साधारणतः जन्म नियंत्रण या गर्भनिरोध वह है जो किसी महिला को गर्भवती होने से रोकता है। गर्भनिरोध का सबसे अच्छा उपाय संयम है। तथापि, कामवासना से अलग रहना, स्वभाविक मानवीय कामवासना के विपरीत है।

चिकित्सा जगत में विभिन्न साधनों, जो स्थायी या अस्थायी हो सकते है, के जरिए गर्भनिरोध की अनुमति दी गई है ताकि जो लोग संयम नहीं बरत सकते वे गर्भधारण करने पर नियंत्रण कर सकें।

बच्चों की संख्या और उनके बीच अंतर रखने के विषय में स्वतंत्रता पूर्वक और उत्तरदायित्व पूर्ण ढ़ंग से निर्णय लेने एवं ऐसा करने के लिए सूचना, शिक्षा और साधन प्राप्त करने के अधिकार को जनन अधिकारों के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में माना जाता है। गर्भनिरोधकों से पुरूष और महिलाएं इन अधिकारों का प्रयोग कर सकती हैं।

भारत में "मिश्रित विधि" का गर्भनिरोधक प्रयोग करने का क्या पैटर्न है?
आधुनिक चिकित्सा जगत में कई गर्भनिरोधक विकल्प उपलब्ध कराए हैं। गर्भ रोकने के लिए विभिन्न विधियों के उपयोग के वितरण पैटर्न को "मिश्रित विधि" कहा जाता है। भारत इस दिशा में अद्वितीय है, यहां महिला बन्ध्यीकरण (नलबंदी) को प्रमुख विधि माना जाता है क्योंकि अधिकांश दंपत्ती अपने परिवार का वांछित आकार के लिए इसी विधि को वरीयता दे रहे हैं और इसे स्थायी विधि के रूप में अपना रहे हैं।

हम अपने जन संचार अभियानों केबावजूद भी लोगों का गर्भनिरोधक व्यवहार बदलने में समर्थ क्यों नहीं हुए?
जनसंचार अभियान उत्पाद का प्रदर्शन कर सकते हैं, सूचना का प्रसार कर सकते हैं, लोगों में रूचि पैदा कर सकते हैं और जनता की राय को प्रभावित कर सकते हैं। वे लोगों को दुकान तक ले जा सकते है, लेकिन उन्हें उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। उत्पाद की अंतर्निहित गुणवत्ता, विक्रय कला, उत्पाद अजमाने के लिए प्रलोभन और विक्रय के बाद अपेक्षित सेवाएं उपलब्ध कराना ऐसे तत्व हैं जो अन्ततः उत्पाद खरीदने और उसका सफल प्रयोग करने के लिए निर्णय को प्रभावित करते हैं।

प्रायः गर्भनिरोधकों के प्रयोग को बढ़ावा देते समय इन मूल बातों की उपेक्षा कर दी जाती है, संचार कौशल के उच्च स्तर कीमांग की जाती है क्योंकि इसका संबंध व्यक्तिगत और अंतरंग विकल्पों से होता है। 1960 में और 1970 के दशक के दौरान अत्यधिक सफल जनसंचार अभियानों ने भारत में गर्भनिरोधकों के बारे में विश्वव्यापी जानकारी प्रदान की। तथापि, वे उस जानकारी को कार्यरूप में परिणत कराने में असफल रहे क्योंकि स्वास्थ्य प्रणाली सेवाएं उपलब्ध कराने में लड़खड़ा गई।

परिवर्तन प्रक्रिया के भिन्न-भिन्न चरणों में लोग भिन्न-भिन्न प्रकार की सूचना की मांग करते हैं। परिवर्तन प्रक्रिया के विभिन्न चरण (समझना, अनुभव करना, अपनाना और परामर्श देना) परामर्श देने, सेवा उपलब्ध कराने, अनुवर्ती कार्यवाही करने और साधनों के लिए अवसर सृजित करने की मांग करते हैं। ऐसा क्रमबद्ध संचार नीति, जो व्यवहार परिवर्तन सूचना भी कहलाती है, का एक दशक पहले तक अभाव था या यह प्रचलन में नहीं थी।

भारत में अंतराल विधि का प्रयोग इतना मंद क्यों है?
अंतराल विधि के मंद प्रचलन के निम्नलिखित कारण है-

  1. इन विधियों की जानकारी/पहुंच का अभाव।
  2. परामर्श और अनुवर्ती सेवाओं की कमी।
  3. अरक्तता, जनन भाग का संक्रमण और यौन संचारित जैसे रोगों से पीड़ित होने के कारण महिलाओं के स्वास्थ्य का स्तर हो जाता है जो विधि से संबंधित जटिलताओं के प्रभाव को और गंभीर बना देता है।
  4. मां और बच्चे के स्वास्थ्य के साथ गर्भनिरोधक सेवाओं का सामांजस्य स्थापित करने से कण्डोम के प्रयोग को बढ़ावा देने का कार्य दुष्कर हो गया है क्योंकि इसमें पुरूष भागीदार को शामिल किया जाना आपेक्षित है तथापि, एच. आई. वी./एड्स के खतरे को देखते हुए दोहरी संरक्षण विधि के रूप में कण्डोम के प्रयोग को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं।
  5. जो दंपत्ती थोड़े समय में लगातार वांछित संख्या मे बच्चे पैदा करना चाहते हैं और बन्ध्यीकरण विधि अपनाते हैं, उनके लिए अंतराल विधि की आवश्यकता कम हो जाती है।
  6. परिवार कल्याण कार्यक्रमों द्वारा बन्ध्यीकरण पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने से भी अंतराल विधि को प्रोत्साहित नहीं किया जाता।
  7. भारत का परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रतिवर्ती विधियों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने में, विशेषतः उन युवा महिलाओं (15-30 वर्ष की आयु वाली) में जो अपनी जनन अवधि की सबसे अधिक जननक्षमता वर्षा में होती है, पूर्णतः असफल हो चुका है जबकि, छोटे परिवार के मानकों पर सूचना अभियान तैयार करना आसान है परन्तु बन्ध्यीकरण के लिए अधिक वरीयता दिए जाने के इस विद्यमान संदर्भ में अंतराल विधि को प्रोत्साहन देना सफल नहीं हुआ।

जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए बच्चो के जन्मों के मध्य अंतराल रखना महत्वपूर्ण क्यों है?
चाहे कितने भी बच्चे क्यों न हो, फिर भी जन्मों के बीच अंतराल का जनसंख्या स्थिरीकरण पर अपना एक स्वतंत्र प्रभाव पड़ता है। दो लगातार गर्भों के बीच अंतराल या अंतर जनसंख्या वृद्धि के संवेग को कम करने में स्वभावतः मदद करता है क्योंकि देर से पैदा हुए बच्चे अपने जनन चरण पर देर से ही पहुंचते हैं।

अंतराल से मां और बच्चे का बेहतर स्वास्थ्य भी सुनिश्चित होता है, जिससे बच्चे के जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है और इस प्रकार बड़े परिवार की इच्छा रखना समाप्त हो जाती है।

अंतराल केवल बच्चे कम पैदा करने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह जनसंख्या के जीवन स्तर को सुधारने के लिए भी महत्वपूर्ण है। दो बच्चों के बीच पर्याप्त अंतर और कम बच्चे पैदा करने से केवल मां और बच्चे का स्वास्थ्य ही बेहतर नहीं बल्कि पुरूषों और महिलाओ को उपलब्धता विकास के अवसरों को भी उन्नत बनाता है, चाहे वे अवसर शिक्षा, रोजगार या सामाजिक-सांस्कृतिक भागीदारी से संबंधित हों। इनसे "वांछित जननक्षमता" - अर्थात एक दंपत्ती अपने परिवार में कितने बच्चे रखना चाहता है, भी कम होती है।

अतः परिवार नियोजन की अस्थायी विधियों के माध्यम से दो बच्चों के जन्म के माध्य अंतराल को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों और कार्यक्रमों को एक विस्तृत रूप में प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है।

अंतराल विधियों को किस प्रकार से बढ़ावा दिया जा सकता है?
अंतराल विधियों के प्रयोग के बढ़ावा देने के लिए मुख्य उपाय एक ओर तो बढ़ी हुई संचार व्यवस्था है और दूसरी ओर दक्ष सेवाएं उपलब्ध कराना है। संचार के महत्व का इस बात से पता चलता है कि आज विवाहित महिलाओँ में से 99 प्रतिशत महिलाएं कम से कम एक आधुनिक गर्भनिरोधक विधि से परिचित है। तथापि, सभी विधियों के बारें जानकारी, जो अवगत विकल्प के लिए अपेक्षित है, केवल 58 प्रतिशत महिलाओं को है और 42.2 प्रतिशत महिलाएं किसी एक विधि का प्रयोग करती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परामर्श देने और व्यक्तिगत रूप से सूचना देने जो अवगत विकल्प के लिए अत्यंत अनिवार्य है, का कार्य स्वास्थ्य कर्मचारियों द्वारा सेवा के अनिवार्य के रूप में नहीं किया जाता।

संचार व्यवस्था और परामर्श सेवाएं उन दंतकथाओं और गलत धारणाओं के बारे में बताने के लिए अनिवार्य हैं जो विधि से संबंधित उन समस्याओं को बताने के लिए पर्याप्त है जिनके कारण गर्भनिरोधक का प्रयोग करना अनिवार्रयतः बंद कर दिया जाता है। महिलाओं को सम्मान दिया जाना चाहिए और उन्हें विभिन्न विधियों और संबंधित पार्श्व प्रभावों के बारे में बताकर उन्हें यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि वे अवगत विकल्प का चयन कर सकें। अनुवर्ती देखरेख, विशेषतः विधि से संबंधित जटिलताओं के आने पर, भी निर्णायक है।

इसके साथ-साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि अच्छी गणवत्ता वाले गर्भनिरोधक सुगमता से उपलब्द्धता हो क्योंकि उनके अभाव में संचार संबंधी कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता। विभिन्न कार्यक्रमों के अधीन देश में स्थानीय कार्यकर्ताओं, समुदाय आधारित सेवा प्रबंधकों के माध्यम से सेवाओं को सामाजिक फ्रेंचाइज देकर और कार्पोरेटों के जरिए सामाजिक विपणन का प्रयास किया जा रहा है।

कुछ ही दंपत्ति पुरूष बन्ध्यीकरण का विकल्प क्यों चुनते हैं?
भारत में जनसंख्या कार्यक्रम काफी समय से महिलाओं पर केन्द्रित हो चुका है, अब वे दिन विदा हो गए जब नसबंदी या पुरूष बन्ध्यीकरण एक प्रमुख विधि थी। गर्भनिरोध की स्थायी विधि का विकल्प चुनने वाले दंपत्तियों से लगभग 67.3 प्रतिशत दंपत्तियों ने 1963 में नसबंदी कराई। यह 1976-1977 के दौरान बढ़कर 75 प्रतिशत हो गई लेकिन इसमें बड़ी तेजी से गिरावट आई और 1980-81 में 21.4 प्रतिशत 1990-91 में 6.2 प्रतिशत और 2000-01 में 2.3 प्रतिशत पुरूषों ने यह विधि अपनाई।

इस विधि अपनाने वाले लोगों की संख्या कम होने का प्रत्यक्ष कारण लोगों पर की गई ज्यादतियां थी, जिसके अंतर्गत एक लक्ष्य निर्धारित करके बिना सोचे समझे जबरदस्ती लोगों की नसबंदी कर दी गई। महिलाओं के लिए बन्ध्यीकरण में लेपरोस्कोपिक तकनीककों के विकास और प्रोत्साहन ने इसे महिलाओं के लिए भी नसबंदी की भांति आसान बना दिया।

यद्यपि समान रूप से आसान होते हुए भी चीर-फाड़ रहित नसबंदी विधि को विभिन्न किवदन्तियों और गलत धारणाओं के कारण वरीयता नहीं दी जा रही है। कामवासना और ताकत समाप्त हो जाने के भय एवं विधि असफल हो जाने और, बच्चे पर नियंत्रण करना तो महिलाओं का उत्तरदायित्व है इस प्रवृति के कारण भी इस विधि को बहुत कम लोगों ने स्वीकार किया है।

यद्यपि, पुरूष बन्ध्यीकरण संबंधी सेवाएं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के स्तर पर नियमित रूप से उपलब्ध कराकर उन तक पहुंच को आसान बना दिया गया है, परन्तु फिर भी जनसंचार अभियानों के जरिए क्षेत्रीय स्तर और वृहत पर कार्यक्रम की सफलता के लिए संचार सहायता को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

यदिलोग अन्य विधियों की अपेक्षा किसी एक विधि विशेष को चुनते है तो उस विधि को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित करने में क्या गलत है?
दंपत्तियों की गर्भनिरोधक आवश्यकताएं उनके जीवन की परिस्थितियों पर आधार भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं। उदाहरणार्थ नवविवाहित दंपत्ति को अंतराल विधि की आवश्यकता हो सकती है जबकि अपने परिवार का आकार पूरा कर चुके दंपत्ति स्थायी विधि अपना सकते हैं। इसी प्रकार स्तनपान कराने वाली महिला की आवश्यकताएं उस महिला से भिन्न हो सकती हैं। यह बात तर्कसंगत भी है कि बड़े पैमाने पर किसी एक विधि विशेष को अपनाना लोगों के लिए संभव नहीं है। विभिन्न आयु वर्गों और विभिन्न पारिवारिक परिस्थितियों वाली महिलाओं और पुरूषों को उपलब्ध विभिन्न प्रकार की विधियों में कोई भी विधि चुन लेना और अपनाना चाहिए।

परन्तु यदि अन्य विधियों की अपेक्षा किसी एक विधि विशेष को सर्वत्र वरीयता दी जाती है तो इसका कारण-अन्य विकल्पों के बारे में पर्याप्त सूचना और जानकारी उपलब्ध न होना, सेवाओं तक सीमित पहुंच होना, या पैराणिक कथाएं और गलत धारणाएं हैं।

प्रायः इससे यह भी पता लगता है कि कार्यक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने के बारे में सेवा प्रबंधकों द्वारा किसी विधि विशेष के संबंध में बहुत बढ़ा चढ़ा कर उल्लेख किया गया है। जहां तक बन्ध्यीकरण का मामला है, जो अपरिवर्तनीय है, उसे अनुवर्ती सेवाओं की सीमित आवश्यकता होती है और इसलिए अन्यविधियों की अपेक्षा इसे बढ़ावा देने की प्रवृति होनी चाहिए। परन्तु इसका आशय स्वतः ही यह नहीं लगा लेना चाहिए कि बन्ध्यीकरण विधि को सबसे अधिक वरीयता दी जाती है।

किसी एक या कुछ विधियों को प्रोत्साहित करने का आश्य कतिपय जीवन परिस्थितियों में केवल महिलाओँ के लिए गर्भनिरोधक विकल्प सीमित करना है। इस प्रकार भारत में महिला बन्ध्यीकरण पर अधिक बल देने का आशय है कि केवल वही महिलाएं गर्भनिरोधक का प्रयोग करने योग्य है जो अपने परिवार का वांछित आकारप्राप्त कर चुकी है। जननक्षमता दरों में लगातार गिरावट आने के कारण यह अनिवार्य हो जाता है कि हमें अधिक संतुलित ^^मिश्रित विधि^^ अपनानी चाहिए।

इंजेक्शन द्वारा दिए जाने योग्य गर्भनिरोधकों के चलन का भारत में कुछ लोग विरोध क्यों करते हैं?
नई गर्भनिरोधक टेक्नोलॉजी जैसे कि इंजेक्शन द्वारा दिए जाने योग्य और आरोपित किए जाने वाले (इंप्लान्ट) हार्मोनल आक्रामक प्रवृति के होते हैं, दीर्घकाल तक क्रियाशील रहते हैं और जब उनका

उपयोग महिलाओं को लक्ष्य करके किया जाता है तब विकासशील देशों में इनके दुरूपयोग किए जाने की अधिक संभावना रहती है। इसके अलावा, इंजेक्शन से दिए जाने योग्य गर्भनिरोधकों से स्वास्थ्य को जोखिम होता है जो भारत में कमजोर शरीर वाली महिलाओं द्वारा सुगता से सहन नहीं किया जा सकता। इस प्रकार इसका उपयोग तो आसानी से किया जा सकता है परन्तु यह स्वास्थ्य संबंधी नई-नई समस्याओ को जन्म देता है जिससे महिला कहीं की भी नहीं रहती।

अधिकांश भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य की स्थिति और उनकी जानकारी का स्तर अच्छा नहीं होता तथा जब इन पर इस आक्रामक टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाता है तब उसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। इस टेक्नोलॉजी के प्रभावी प्रयोग के लिए स्क्रीनिंग और अनुवर्ती (फॉलोअप मूल) सिद्धांत हैं। चूंकि इन दोनों को उस प्रणाली में सुरक्षित नहीं माना जा सकता जिस पर अवसंरचना और मानव संसाधनों के लिए अधिक दबाव डाला जाता है। बहुत से लोग यह तर्क देते हैं कि ऐसी विधियों को चलन से विशेषतः सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली से बाहर रखना ही बेहतर है। इंजेक्शन द्वारा दिए जाने योग्य गर्भनिरोधक भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के स्वास्थ्य कार्यक्रम और परिवार कल्याण कार्यक्रम के भाग नहीं हैं परन्तु वे बाजार में उपलब्ध हैं।

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युवा और जनसंख्या

हमें युवाओं पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता क्यों होती है? क्या शादी के समय जनन स्वास्थ्य प्रारम्भ नहीं होता?
भविष्य में भारत की जनसंख्या की वृद्धि किस प्रकार होगी, यह बात 15-24 वर्ष की आयु वर्ग वाले लोगों सहित 1890 लाख लोगों पर निर्भर करती है। शिक्षा और रोजगार के अवसरों के अलावा यौन और जनन स्वास्थ्य के संबंध में सूचना एवं मार्गदर्शन देने के लिए उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने, जनसंख्या और विकास कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

किशोर यौंन और जनन स्वास्थ्य कार्यक्रम उन्हें उत्तरदायी और ज्ञात निर्णय लेने योग्य बनाते हैं। यह बात विशेषतः उन युवा महिलाओँ के मामले में अधिक महत्वपूर्ण है जिन्हें ऐसे अधिकार दिए जाने चाहिए जिससे वे अपने यौन और जनन जीवन पर नियंत्रण रखने, अवपीड़न, पक्षपात और हिंसा से मुक्त रहने के अपने अधिकार का प्रयोग कर सकें। कामुकता के बारे में, यौन संबंध के बारे में, अवांछित गर्भधारण करने से बचने के बारे में और यौन संचारित रोगों के बारे में बेहतर सूचना होने से युवा लोगों के जीवन स्तर में सुधार आएगा।

किशोर लड़कियों और लड़कों पर ध्यान केन्द्रित करने के महत्व के समर्थन में निम्नलिखित तथ्य दिए जाते हैः-

  1. भारत में 15-19 वर्ष की आयु वर्ग वाली लड़कियों में से लगभग 25 प्रतिशत लड़कियां 19 वर्ष की आयु होने से पहले अपने बच्चे को जन्म दे देती हैं।
  2. 18 वर्ष की आयु होने से पहले ही गर्भधारण करने से स्वास्थ्य के लिए बहुत से जोखिम पैदा हो जाते हैं। 20-24 वर्ष की आयु वाली महिलाओं की अपेक्षा कम उम्र वाली लड़कियों की गर्भावस्था या प्रसव के दौरान मृत्यु होने की बहुत संभावना होती है।
  3. तरूण माताओं के बच्चे अधिक पैदा होते हैं क्योंकि वे गर्भ निरोधकों का प्रयोग नहीं करना चाहती।
  4. अंतर्राष्ट्रीय योजनाबद्ध पितृत्व संघ के अनुसार भारत में होने वाले गर्भपातों में से 14 प्रतिशत गर्भपात तरूण महिलाएं कराती हैं।
  5. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यू. एन. एफ. पी. ए.) के अनुसार यदि पहले बच्चे के जन्म के लिए मां की आयु 18 वर्ष से 23 वर्ष तक कर दी जाए तो इससे जनसंख्या संवेग मे 40 प्रतिशत से अधिक गिरावट आ सकती है।
  6. एच. आई. वी./एड्स पर संयुक्त राष्ट्र के संयुक्त कार्यक्रम के अनुसार भारत में एच. आई.वी./एड्स संक्रमण से पीड़ित लोगों में से लगभग आधे लोग 25 वर्ष से कम आयु वाले हैं।

क्या किशोर - किशोरियों को यौन शिक्षा देने से स्वच्छंद संभोग को बढ़ावा मिलता है?
नहीं, इस प्रचलित विश्वास के विपरीत, यौन शिक्षा स्वच्छंद संभोग को बढ़ावा नहीं देती। वस्तुतः ऐसे कार्यक्रम असुरक्षित यौन संबंध से जुड़ी चिंताओं को दूर करते हैं और सुरक्षित यौन संबंधों को प्रोत्साहित करते हैं।

यौन शिक्षा कार्यक्रम लिखे गए 1050 वैज्ञानिक लेखों का विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा की गई समीक्षा में अनुसंधान कर्ताओँ ने यह देखा कि इस विवाद का कहीं कोई समर्थन नहीं किया गया कि यौन शिक्षा से यौन अनुभव प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है या क्रियाकलापों में वृद्धि होती है।

यदि कोई प्रभाव नजर आता है तो वह अपवाद से रहित है क्योंकि ये मैथुन स्थगित करने और / या गर्भनिरोधक का प्रभावी प्रयोग करने की दिशा में हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि उचित और समय पर सूचना उपलब्ध करने में असफल रहना- "अनैच्छिक गर्भ के अवांछित परिणामों और यौन संचारित रोगों के संचारण को कम करने के अवसर समाप्त करना है, और इसलिए इससे हमारे युवाओं को हानि होती है"।

किशोर जनन और स्वास्थ्य कार्यक्रमों में माता-पिता और समाज को विश्वास मे लेना चाहिए ताकि एक ऐसा वातावरण तैयार किया जा सके जिसमें किशोर अपने विकल्पों का प्रयोग कर सकें। एक ऐसी समाकलित पहुंच के अभाव में इस गतल भय के आधार पर इस कार्यक्रम का विरोध किया जा रहा है कि इससे स्वच्छंद संभोग मिलेगा। लड़के और लड़कियों दोनों को एक साथ लेकर कार्य करने की आवश्यकता है ताकि वे दोनों यौन जनन प्रक्रिया के महत्व को समझ सकें। यह यौन अधिकारों की उचित जानकारी देता है और उनका उचित प्रयोग करना भी बताता है।

अधिक उम्र में शादी करने से जनसंख्या स्थिरीकरण पर किस प्रकार से प्रभाव पड़ता है?
भारत वर्ष में शादी लगभग सार्वभौमिक है। शादी के समय की आयु की सीधा संबंध महिलाओँ को उपलब्ध शिक्षा और रोजगार के अवसरों से होता है। अशिक्षित और / या बेरोजगार महिलाओं की अपेक्षा बेहतर शिक्षा प्राप्त और रोजगार में नियुक्त महिलाएं देर से शादी करती हैं।

1960 के दशक में शादी की न्यूनतम आयु 17 वर्ष थी जो 1990 के दशक में बढ़ाकर 20 वर्ष कर दी गई। फिर भी, लगभग 43 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष की आयु होने से पहले ही कर दी जाती है जो कि भारत में महिलाओं के लिए वैद्य आयु है। कम आयु में शादी करने के अन्य कारणों में से एक कारण यह भय भी है कि लड़की अपना कौमार्य नष्ट कर सकती है, जिसके संरक्षण के लिए उसके परिवार की उत्तरदायी माना जाता है कि शादी करके इस उत्तरदायित्व का निर्वाह कर दिया गया है।

प्रायः जल्दी शादी होने से गर्भ भी जल्दी रह जाता है, जैसा कि अधिकांश महिलाएं शादी के बाद शीघ्र ही गर्भवती हो जाती हैं क्योंकि गर्भनिरोधक सेवाओँ की जानकारी और पहुंच का अभाव होता है तथा शादी के प्रथम वर्ष के भीतर ही एक उत्तराधिकारी देने के लिए उन पर परिवार का दबाव होता है। दूसरी तरफ बच्चा पैदा करके अपना "पौरूष" सिद्ध करने की इच्छा, शादी के तुरंत

बाद गर्भनिरोधक विधियों का प्रयोग करने से रोकती है। बच्चे को जन्म देना शादी की सुरक्षा के रूप में भी देखा जाता है क्योंकि जब उसकी पत्नी उसके बच्चे की मां बन जाती है तब अपनी पत्नी का उत्तरदायित्व संभालने का भार उस व्यक्ति पर और बढ़ जाता है।

जब किसी महिला के बच्चे पैदा नहीं होते तब पति पत्नी के संबंधों का विच्छेद होना और पत्नी को तलाक देने के मामले बहुत ही सामान्य हो गए हैं। किशोर अवस्था में शादी के तुरंत बाद या अन्यथा गर्भ रह जानें से मां और बच्चे के स्वास्थ्य और जीवन के लिए खतरा बढ़ जाता है। बच्चों की मृत्यु हो जाने पर दंपत्ती और बच्चे पैदा करना चाहते हैं।

इस वृहत स्तर पर जल्दी शादी करने और जल्दी बच्चा पैदा करने के परिणाम स्वरूप पीढ़ियां तेजी से बदलती हैं, जनसंख्या स्थिरीकरण में बाधा उत्पन्न होती हैं, चाहे दंपत्ती एक या दो बच्चे पैदा क्यों न करें।

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एच.आई.वी /एड्स और जनसंख्या

हमें जनसंख्या कार्यक्रम में एच. आई. वी. / एड्स के विषय पर ध्यान क्यों केन्द्रित करना चाहिए?
वे युवा पुरूष और महिलाएं जो अति कामुक होते हैं और देश के लिए मजदूर पैदा करते हैं वे एच.आई.वी./एड्स के प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं। प्रत्येक 14 सेकेण्ड में युवा व्यक्ति एच.आई.वी/एड्स से संक्रमित हो जाता है। औरर संयुक्त राष्ट्र कोष (यू. एन. एफ. पी. ए.), विश्व जनसंख्या रिपोर्ट, 2003 की स्थिति के अनुसार विश्व भर में एच.आई.वी संक्रमण के नए रोगियों में से लगभग आधे रोगी युवा वर्ग के होते हैं जिनमें महिलाओँ की संख्या अधिक होती है।

युवा वर्ग में उच्च मृत्युदर होने के परिणामस्वरूप उत्पादनकारी श्रमिक कम हो जाते हैं और उनके आश्रितों, बच्चों और बुजुर्गों की संख्या बढ़ जाती है। इससे अत्यंत गरीबी फैलती है, स्वास्थ्य खराब होता है और आर्थिक ह्रास होता है। चूंकि जनसंख्या कार्यक्रमों का अंतिम उद्देश्य लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना है न कि मात्र जनसंख्या कम करना। इसलिए एच. आई. वी./एड्स की रोकथाम करना जनसंख्या कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण अंग बन जाता है।

मृत्युदर कम करके और जनन क्षमता को सीमित करके विश्वव्यापी जनसंख्या वृद्धि को कम किया गया है न कि लोगों को बीमारी का शिकार बनाकर।

 
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  प्रतिलिपि अधिकार 2007,  जनसंख्या स्थिरता कोष , सर्वाधिकार सुरक्षित